Wo Sarwar-e-Kishwar-e-Risaalat Naat Lyrics

Wo Sarwar-e-Kishwar-e-Risaalat Naat Lyrics

 

 

Wo Sarwar-e-Kishwar-e-Risaalat, Jo Arsh Par Jalwa-gar Hue The | Qaseeda-e-Me’raj

 

वो सरवर-ए-किशवर-ए-रिसालत, जो ‘अर्श पर जल्वा-गर हुए थे
नए निराले तरब के सामाँ, ‘अरब के मेहमान के लिए थे

बहार है शादियाँ मुबारक ! चमन को आबादियाँ मुबारक !
मलक फ़लक अपनी अपनी लै में ये घुर ‘अनादिल का बोलते थे

वहाँ फ़लक पर, यहाँ ज़मीं में, रची थी शादी, मची थी धूमें
उधर से अनवार हँसते आते, इधर से नफ़्हात उठ रहे थे

ये छूट पड़ती थी उन के रुख़ की कि ‘अर्श तक चाँदनी थी छटकी
वो रात क्या जगमगा रही थी ! जगह जगह नस्ब आईने थे

नई दुल्हन की फबन में का’बा, निखर के सँवरा, सँवर के निखरा
हजर के सदक़े ! कमर के इक तिल में रंग लाखों बनाव के थे

नज़र में दूल्हा के प्यारे जल्वे, हया से मेहराब सर झुकाए
सियाह पर्दे के मुँह पर आँचल तजल्ली-ए-ज़ात-ए-बह्त से थे

ख़ुशी के बादल उमँड के आए, दिलों के ताऊस रंग लाए
वो नग़्मा-ए-ना’त का समाँ था, हरम को ख़ुद वज्द आ रहे थे

ये झूमा मीज़ाब-ए-ज़र का झूमर कि आ रहा कान पर ढलक कर
फूहार बरसी तो मोती झड़ कर हतीम की गोद में भरे थे

दुल्हन की ख़ुश्बू से मस्त कपड़े, नसीम-ए-गुस्ताख़ आँचलों से
ग़िलाफ़-ए-मुश्कीं जो उड़ रहा था, ग़ज़ाल नाफ़े बसा रहे थे

पहाड़ियों का वो हुस्न-ए-तज़ईं, वो ऊँची चोटी, वो नाज़-ओ-तम्क़ीं !
सबा से सब्ज़ा में लहरें आतीं, दुपट्टे धानी चुने हुए थे

नहा के नहरों ने वो चमकता लिबास आब-ए-रवाँ का पहना
कि मौजें छड़ियाँ थी धार लचका, हबाब-ए-ताबाँ के थल टके थे

पुराना पुर-दाग़ मलगजा था, उठा दिया फ़र्श चाँदनी का
हुजूम-ए-तार-ए-निगह से कोसों क़दम क़दम फ़र्श बादले थे

ग़ुबार बन कर निसार जाएँ, कहाँ अब उस रह-गुज़र को पाएँ
हमारे दिल, हूरियों की आँखें, फ़रिश्तों के पर जहाँ बिछे थे

ख़ुदा ही दे सब्र, जान-ए-पुर-ग़म ! दिखाऊँ क्यूँ-कर तुझे वो ‘आलम
जब उन को झुरमुट में ले के क़ुदसी जिनाँ का दूल्हा बना रहे थे

उतार कर उन के रुख़ का सदक़ा, ये नूर का बट रहा था बाड़ा
कि चाँद सूरज मचल मचल कर जबीं की ख़ैरात माँगते थे

वोही तो अब तक छलक रहा है, वोही तो जोबन टपक रहा है
नहाने में जो गिरा था पानी, कटोरे तारों ने भर लिये थे

बचा जो तल्वों का उन के धोवन, बना वो जन्नत का रंग-ओ-रोग़न
जिन्हों ने दूल्हा की पाई उतरन, वो फूल गुलज़ार-ए-नूर के थे

ख़बर ये तहवील-ए-मेहर की थी कि रुत सुहानी घड़ी फिरेगी
वहाँ की पोशाक ज़ेब-ए-तन की, यहाँ का जोड़ा बढ़ा चुके थे

तजल्ली-ए-हक़ का सेहरा सर पर, सलात-ओ-तस्लीम की निछावर
दो रूया क़ुदसी परे जमा कर खड़े सलामी के वास्ते थे

जो हम भी वाँ होते ख़ाक-ए-गुलशन, लिपट के क़दमों से लेते उतरन
मगर करें क्या नसीब में तो ये ना-मुरादी के दिन लिखे थे

अभी न आए थे पुश्त-ए-ज़ीं तक कि सर हुई मग़्फ़िरत की शिल्लिक
सदा शफ़ा’अत ने दी मुबारक ! गुनाह मस्ताना झूमते थे

‘अजब न था रख़्श का चमकना, ग़ज़ाल-ए-दम-ख़ुर्दा सा भड़कना
शु’आ’एँ बुक्के उड़ा रही थीं, तड़पते आँखों पे सा’इक़े थे

हुजूम-ए-उम्मीद है घटाओ, मुरादें दे कर इन्हें हटाओ
अदब की बागें लिये बढ़ाओ, मलाइका में ये ग़ुलग़ुले थे

उठी जो गर्द-ए-रह-ए-मुनव्वर, वो नूर बरसा कि रास्ते भर
घिरे थे बादल, भरे थे जल-थल, उमँड़ के जंगल उबल रहे थे

सितम किया, कैसी मत कटी थी, क़मर ! वो ख़ाक उन के रह-गुज़र की
उठा न लाया कि मलते मलते ये दाग़ सब देखता मिटे थे

बुराक़ के नक़्श-ए-सुम के सदक़े, वो गुल खिलाए कि सारे रस्ते
महकते गुलबुन, लहकते गुलशन हरे भरे लहलहा रहे थे

नमाज़-ए-अक़्सा में था यही सिर्र, ‘अयाँ हों मा’नी-ए-अव्वल-आख़िर
कि दस्त-बस्ता हैं पीछे हाज़िर, जो सल्तनत आगे कर गए थे

ये उन की आमद का दबदबा था, निखार हर शय का हो रहा था
नुजूम-ओ-अफ़लाक, जाम-ओ-मीना उजालते थे, खँगालते थे

निक़ाब उलटे वो मेहर-ए-अनवर जलाल-ए-रुख़्सार गर्मियों पर
फ़लक को हैबत से तप चढ़ी थी, तपकते अंजुम के आबले थे

ये जोशिश-ए-नूर का असर था कि आब-ए-गौहर कमर कमर था
सफ़ा-ए-रह से फिसल फिसल कर सितारे क़दमों पे लौटते थे

बढ़ा ये लहरा के बहर-ए-वहदत कि धुल गया नाम-ए-रेग कसरत
फ़लक के टीलों की क्या हक़ीक़त ! ये ‘अर्श-ओ-कुर्सी दो बुलबुले थे

वो ज़िल्ल-ए-रहमत, वो रुख़ के जल्वे कि तारे छुपते, न खिलने पाते
सुनहरी ज़र बफ़्त, ऊदी अत्लस, ये थान सब धूप छाओं के थे

चला वो सर्व-ए-चमाँ ख़िरामाँ, न रुक सका सिदरा से भी दामाँ
पलक झपकती रही वो कब के सब ईन-ओ-आँ से गुज़र चुके थे

झलक सी इक क़ुदसियों पर आई, हवा भी दामन की फिर न पाई
सवारी दूल्हा की दूर पहुँची, बरात में होश ही गए थे

थके थे रूह-उल-अमीं के बाज़ू, छुटा वो दामन, कहाँ वो पहलू
रिकाब छूटी, उम्मीद टूटी, निगाह-ए-हसरत के वलवले थे

रविश की गरमी को जिस ने सोचा, दिमाग़ से इक भबूका फूटा
ख़िरद के जंगल में फूल चमका, दहर-दहर पेड़ जल रहे थे

जिलौ में जो मुर्ग़-ए-‘अक़्ल उड़े थे, ‘अजब बुरे हालों गिरते पड़ते
वो सिदरा ही पर रहे थे थक कर, चढ़ा था दम तेवर आ गए थे

क़वी थे मुर्ग़ान-ए-वहम के पर, उड़े तो उड़ने को और दम-भर
उठाई सीने की ऐसी ठोकर कि ख़ून-ए-अंदेशा थूकते थे

सुना ये इतने में ‘अर्श-ए-हक़ ने कि ले मुबारक हों ताज वाले
वोही क़दम ख़ैर से फिर आए, जो पहले ताज-ए-शरफ़ तेरे थे

ये सुन के बे-ख़ुद पुकार उठ्ठा, निसार जाऊँ ! कहाँ हैं आक़ा ?
फिर उन के तल्वों का पाऊँ बोसा, ये मेरी आँखों के दिन फिरे थे

झुका था मुजरे को ‘अर्श-ए-आ’ला, गिरे थे सज्दे में बज़्म-ए-बाला
ये आँखें क़दमों से मल रहा था, वो गिर्द क़ुर्बान हो रहे थे

ज़ियाएँ कुछ ‘अर्श पर ये आईं, कि सारी क़िन्दीलें झिल-मिलाईं
हुज़ूर-ए-ख़ुर्शीद क्या चमकते ! चराग़ मुँह अपना देखते थे

यही समाँ था कि पैक-ए-रहमत ख़बर ये लाया कि चलिये हज़रत
तुम्हारी ख़ातिर कुशादा हैं जो कलीम पर बंद रास्ते थे

बढ़, ए मुहम्मद ! क़रीं हो, अहमद ! क़रीब आ, सरवर-ए-मुमज्जद !
निसार जाऊँ ! ये क्या निदा थी, ये क्या समाँ था, ये क्या मज़े थे

तबारकल्लाह शान तेरी, तुझी को ज़ेबा है बे-नियाज़ी
कहीं तो वो जोश-ए-लन्-तरानी, कहीं तक़ाज़े विसाल के थे

ख़िरद से कह दो कि सर झुका ले, गुमाँ से गुज़रे गुज़रने वाले
पड़े हैं याँ ख़ुद जिहत को लाले, किसे बताए किधर गए थे

सुराग़-ए-ऐन-ओ-मता कहाँ था ? निशान-ए-कैफ़-ओ-इला कहाँ था ?
न कोई राही, न कोई साथी, न संग-ए-मंज़िल, न मरहले थे

उधर से पैहम तक़ाज़े आना, इधर था मुश्किल क़दम बढ़ाना
जलाल-ओ-हैबत का सामना था, जमाल-ओ-रहमत उभारते थे

बढ़े तो लेकिन झिझकते डरते, हया से झुकते, अदब से रुकते
जो क़ुर्ब उन्हीं की रविश पे रखते तो लाखों मंज़िल के फ़ासिले थे

पर इन का बढ़ना तो नाम को था, हक़ीक़तन फ़े’ल था उधर का
तनज़्ज़ुलों में तरक़्क़ी अफ़्ज़ा, दना तदल्ला के सिलसिले थे

हुवा न आख़िर कि एक बजरा तमव्वुज-ए-बहर-ए-हू में उभरा
दना की गोदी में उन को ले कर फ़ना के लंगर उठा दिए थे

किसे मिले घाट का किनारा, किधर से गुज़रा, कहाँ उतारा
भरा जो मिस्ल-ए-नज़र तरारा, वो अपनी आँखों से ख़ुद छुपे थे

उठे जो क़स्र-ए-दना के पर्दे, कोई ख़बर दे तो क्या ख़बर दे ?
वहाँ तो जा ही नहीं दुई की, न कह के वो भी न थे अरे थे

वो बाग़ कुछ ऐसा रंग लाया, कि ग़ुंचा-ओ-गुल का फ़र्क़ उठाया
गिरह में कलियों की बाग़ फूले, गुलों के तुक्मे लगे हुए थे

मुहीत-ओ-मर्कज़ में फ़र्क़ मुश्किल, रहे न फ़ासिल ख़ुतूत-ए-वासिल
कमानें हैरत में सर झुकाए ‘अजीब चक्कर में दाइरे थे

हिजाब उठने में लाखों पर्दे, हर एक पर्दे में लाखों जल्वे
‘अजब घड़ी थी कि वस्ल-ओ-फ़ुर्क़त जनम के बिछड़े गले मिले थे

ज़बानें सूखी दिखा के मौजें तड़प रही थीं कि पानी पाएँ
भँवर को ये ज़ो’फ़-ए-तिश्नगी था कि हल्क़े आँखों में पड़ गए थे

वोही है अव्वल, वोही है आख़िर, वोही है बातिन, वोही है ज़ाहिर
उसी के जल्वे, उसी से मिलने, उसी से उस की तरफ़ गए थे

कमान-ए-इम्काँ के झूटे नुक़्तो ! तुम अव्वल आख़िर के फेर में हो
मुहीत की चाल से तो पूछो, किधर से आए, किधर गए थे

इधर से थीं नज़्र-ए-शह नमाज़ें, उधर से इन’आम-ए-ख़ुसरवी में
सलाम-ओ-रहमत के हार गुंध कर गुलू-ए-पुर-नूर में पड़े थे

ज़बान को इंतिज़ार-ए-गुफ़्तन तो गोश को हसरत-ए-शुनीदन
यहाँ जो कहना था कह लिया था, जो बात सुननी थी सुन चुके थे

वो बुर्ज-ए-बतहा का माह-पारा, बिहिश्त की सैर को सिधारा
चमक पे था ख़ुल्द का सितारा कि उस क़मर के क़दम गए थे

सुरूर-ए-मक़्दम की रौशनी थी कि ताबिशों से मह-ए-‘अरब की
जिनाँ के गुलशन थे झाड़-फ़र्शी, जो फूल थे सब कँवल बने थे

तरब की नाज़िश कि हाँ लचकिये, अदब वो बंदिश कि हिल न सकिये
ये जोश-ए-ज़िद्दैन था कि पौदे कशा-कशे अर्रा के तले थे

ख़ुदा की क़ुदरत कि चाँद हक़ के करोरों मंज़िल में जल्वा कर के
अभी न तारों की छाओं बदली कि नूर के तड़के आ लिये थे

नबी-ए-रहमत ! शफ़ी’-ए-उम्मत ! रज़ा पे लिल्लाह हो ‘इनायत
इसे भी उन ख़िल’अतों से हिस्सा जो ख़ास रहमत के वाँ बटे थे

सना-ए-सरकार है वज़ीफ़ा, क़बूल-ए-सरकार है तमन्ना
न शा’इरी की हवस, न परवा रवी थी क्या कैसे क़ाफ़िये थे

शायर:
इमाम अहमद रज़ा ख़ान

ना’त-ख़्वाँ:
ओवैस रज़ा क़ादरी

 

wo sarwar-e-kishwar-e-risaalat
jo ‘arsh par jalwa-gar hue the
nae niraale tarab ke saamaa.n
‘arab ke mehmaan ke lie the

bahaar hai shaadiyaa.n mubaarak !
chaman ko aabaadiyaa.n mubaarak !
malak falak apni apni lai me.n
ye ghur ‘anaadil ka bolte the

wahaa.n falak par, yahaa.n zamee.n me.n
rachi thi shaadi, machi thi dhoome.n
udhar se anwaar hanste aate
idhar se nafhaat uTh rahe the

ye chhooT pa.Dti thi un ke ruKH ki
ki ‘arsh tak chaandni thi chhaTki
wo raat kya jagmaga rahi thi !
jagah jagah nasb aaine the

nai dulhan ki phaban me.n kaa’ba
nikhar ke sa.nwra, sa.nwar ke nikhra
hajar ke sadqe ! kamar ke ik til
me.n rang laakho.n banaaw ke the

nazar me.n dulha ke pyaare jalwe
haya se mehraab sar jhukaae
siyaah parde ke moonh par aanchal
tajalli-e-zaat-e-baht se the

KHushi ke baadal umand ke aae
dilo.n ke taaoos rang laae
wo naGma-e-naa’t ka samaa.n tha
haram ko KHud wajd aa rahe the

ye jhooma meezaab-e-zar ka jhoomar
ki aa raha kaan par Dhalak kar
phoohaar barsi to moti jha.D kar
hateem ki god me.n bhare the

dulhan ki KHushboo se mast kap.De
naseem-e-gustaaKH aanchlo.n se
Gilaaf-e-mushkee.n jo u.D raha tha
Gazaal naafe basa rahe the

pahaa.Diyo.n ka wo husn-e-taz.ee.n
wo unchi choTi, wo naaz-o-tamkee.n !
saba se sabza me.n lahre.n aati.n
dupaTTe dhaani chune hue the

naha ke nahro.n ne wo chamakta
libaas aab-e-rawaa.n ka pahna
ki mauje.n chha.Diyaa.n thi dhaar lachka
habaab-e-taabaa.n ke thal Take the

puraana pur-daaG malgaja tha
uTha diya farsh chaandni ka
hujoom-e-taar-e-nigah se koso.n
qadam qadam farsh baadle the

Gubaar ban kar nisaar jaae.n
kahaa.n ab us rah-guzar ko paae.n
hamaare dil, hooriyo.n ko aankhe.n
farishto.n ke par jahaa.n bichhe the

KHuda hi de sabr, jaan-e-pur-Gam !
dikhaau.n kyu.n-kar tujhe wo ‘aalam
jab un ko jhurmuT me.n le ke qudsi
jinaa.n ka dulha bana rahe the

utaar kar un ke ruKH ka sadqa
ye noor ka baT raha tha baa.Da
ki chaand sooraj machal machal kar
jabee.n ki KHairaat maangte the

wohi to ab tak chhalak raha hai
wohi to joban Tapak raha hai
nahaane me.n jo gira tha paani
kaTore taaro.n ne bhar liye the

bacha jo talwo.n ka un ke dhowan
bana wo jannat ka rang-o-roGan
jinho.n ne dulha ki paai utran
wo phool gulzaar-e-noor ke the

KHabar ye tahweel-e-mehr ki thi
ki rut suhaani gha.Di phiregi
wahaa.n ki poshaak zeb-e-tan ki
yahaa.n ka jo.Da ba.Dha chuke the

tajalli-e-haq ka sehra sar par
salaat-o-tasleem ki nichhaawar
do rooya qudsi pare jama kar
kha.De salaami ke waaste the

jo ham bhi waa.n hote KHaak-e-gulshan
lipaT ke qadmo.n se lete utran
magar kare.n kya naseeb me.n to
ye naa-muraadi ke din likhe the

abhi na aae the pusht-e-zee.n tak
ki sar hui maGfirat ki shillik
sada shafaa’at ne di mubaarak !
gunaah mastaana jhoomte the

‘ajab na tha raKHsh ka chamakna
Gazaal-e-dam-KHurda sa bha.Dakna
shu’aa’e.n bukke u.Da rahi thi.n
ta.Dapte aankho.n pe saa’iqe the

hujoom-e-ummeed hai ghaTaao
muraade.n de kar inhe.n haTaao
adab ki baage.n liye ba.Dhaao
malaaika me.n ye GulGule the

uThi jo gard-e-rah-e-munawwar
wo noor barsa ki raaste bhar
ghire the baadal, bhare the jhal-thal
uman.D ke jangal ubal rahe the

sitam kiya, kaisi mat kaTi thi
qamar ! wo KHaak un ke rah-guzar ki
uTha na laaya ki malte malte
ye daaG sab dekhta miTe the

buraaq ke naqsh-e-sum ke sadqe
wo gul khilaae ki saare raste
mahakte gulbun, lahakte gulshan
hare bhare lahlaha rahe the

namaaz-e-aqsa me.n tha yahi sirr
‘ayaa.n ho.n maa’ni-e-awwal-aaKHir
ki dast-basta hai.n peeche haazir
jo saltanat aage kar gae the

ye un ki aamad ka dabdaba tha
nikhaar har shai ka ho raha tha
nojoom-o-aflaak, jaam-o-meena
ujaalte the, khangaalte the

niqaab ulTe wo mehr-e-anwar
jalaal-e-ruKHsaar garmiyo.n par
falak ko haibat se tap cha.Dhi thi
tapakte anjum ke aable the

ye joshish-e-noor ka asar tha
ki aab-e-gauhar kamar kamar tha
safa-e-rah se phisal phisal kar
sitaare qadmo.n pe lauTte the

ba.Dha ye lahra ke bahr-e-wahdat
ki dhul gaya naam-e-reg kasrat
falak ke Teelo.n ki kya haqeeqat !
ye ‘arsh-o-kursi do bulbule the

wo zill-e-rahmat, wo ruKH ke jalwe
ki taare chhupte, na khilne paate
sunhri zar baft, oodi atlas
ye thaan sab dhoop chaao.n ke the

chala wo sarw-e-chamaa.n KHiraamaa.n
na ruk saka sidra se bhi daamaa.n
palak jhapakti rahi wo kab ke
sab een-o-aa.n se guzar chuke the

jhalak si ik qudsiyo.n par aai
hawa bhi daaman ki phir na paai
sawaari dulha ki door pahunchi
baraat me.n hosh hi gae the

thake the rooh-ul-amee.n ke baazu
chhuTa wo daaman, kahaa.n wo pahlu
rikaab chhooTi, ummeed TooTi
nigaah-e-hasrat ke walwale the

ravish ki garmi ko jis ne socha
dimaaG se ik bhabooka phooTa
KHirad ke jangal me.n phool chamka
dahar-dahar pe.D jal rahe the

jilau me.n jo murG-e-‘aql u.De the
‘ajab bure haalo.n girte pa.Dte
wo sidra hi par rahe the thak kar
cha.Dha tha dam tewar aa gae the

qawi the murGaan-e-wahm ke par
u.De to u.Dne ko aur dam-bhar
uThaai seene ki aisi Thokar
ki KHoon-e-andesha thookte the

suna ye itne me.n ‘arsh-e-haq ne
ki le mubaarak ho.n taaj waale
wohi qadam KHair se phir aae
jo pahle taaj-e-sharaf tere the

ye sun ke be-KHud pukaar uThTha
nisaar jaau.n ! kahaa.n hai.n aaqa ?
phir un ke talwo.n ka paau.n bosa
ye meri aankho.n ke din phire the

jhuka tha mujre ko ‘arsh-e-aa’la
gire the sajde me.n bazm-e-baala
ye aankhe.n qadmo.n se mal raha tha
wo gird qurbaan ho rahe the

ziyaae.n kuchh ‘arsh par ye aaee.n
ki saari qindeele.n jhil-milaaee.n
huzoor-e-KHurshid kya chamakte !
chraaG moonh apna dekhte the

yahi samaa.n tha ki paik-e-rahmat
KHabar ye laaya ki chaliye hazrat
tumhaari KHaatir kushaada hai.n jo
kaleem par band raaste the

ba.Dh, ai muhammad ! qaree.n ho, ahmad !
qareeb aa, sarwar-e-mumajjad !
nisaar jaau.n ! ye kya nida thi
ye kya samaa.n tha, ye kya maze the

tabaarakallah shaan teri
tujhi ko zeba hai be-niyaazi
kahi.n to wo josh-e-lan-taraani
kahi.n taqaaze wisaal ke the

KHirad se kah do ki sar jhuka le
gumaa.n se guzre guzarne waale
pa.De hai.n yaa.n KHud jihat ko laale
kise bataae kidhar gae the

suraaG-e-ain-o-mataa kahaa.n tha ?
nishaan-e-kaif-o-ila kahaa.n tha ?
na koi raahi, na koi saathi
na sang-e-manzil, na marhale the

udhar se paiham taqaaze aana
idhar tha mushkil qadam ba.Dhaana
jalaal-o-haibat ka saamna tha
jamaal-o-rahmat ubhaarte the

ba.Dhe to lekin jhijhakte Darte
haya se jhukte, adab se rukhte
jo qurb unhi.n ki rawish pe rakhte
to laakho.n manzil ke faasile the

par in ka ba.Dhna to naam ko tha
haqeeqatan fe’l tha udhar ka
tanazzulo.n me.n taraqqi afza
dana tadalla ke silsile the

huwa na aaKHir ki ek bajra
tamawwuj-e-bahr-e-hoo me.n ubhra
dana ki godi me.n un ko le kar
fana ke langar uTha die the

kise mile ghaaT ka kinaara
kidhar se guzra, kahaa.n utaara
bhara jo misl-e-nazar taraara
wo apni aankho.n se KHud chhupe the

uThe jo qasr-e-dana ke parde
koi KHabar de to kya KHabar de ?
wahaa.n to jaa hi nahi.n dui ki
na kah ke wo bhi na the are the

wo baaG kuchh aisa rang laaya
ki Guncha-o-gul ka farq uThaaya
girah me.n kaliyo.n ki baaG phoole
gulo.n ke tukme lage hue the

muheet-o-markaz me.n farq mushkil
rahe na faasil KHutoot-e-waasil
kamaane.n hairat me.n sar jhukaae
‘ajeeb chakkar me.n daaire the

hijaab uThne me.n laakho.n parde
har ek parde me.n laakho.n jalwe
‘ajab gha.Di thi ki wasl-o-furqat
janam ke bichh.De gale mile the

zabaane.n sookhi dikha ke mauje.n
ta.Dap rahi thi.n ki paani paae.n
bhanwar ko ye zo’f-e-tishnagi tha
ki halqe aankho.n me.n pa.D gae the

wohi hai awwal, wohi hai aaKHir
wohi hai baatin, wohi hai zaahir
usi ke jalwe, usi se milne
usi se us ki taraf gae the

kamaan-e-imkaa.n ke jhooTe nuqto !
tum awwal aaKHir ke pher me.n ho
muheet ki chaal se to poochho
kidhar se aae, kidhar gae the

idhar se thi.n nazr-e-shah namaaze.n
udhar se in’aam-e-KHusrawi me.n
salaam-o-rahmat ke haar gundh kar
guloo-e-pur-noor me.n pa.De the

zabaan ko intizaar-e-guftan
to gosh ko hasrat-e-shuneedan
yahaa.n jo kahna tha kah liya tha
jo baat sun.ni thi sun chuke the

wo burj-e-bat.ha ka maah-paara
bihisht ki sair ko sidhaara
chamak pe tha KHuld ka sitaara
ki us qamar ke qadam gae the

suroor-e-maqdam ki raushni thi
ki taabisho.n se mah-e-‘arab ki
jinaa.n ke gulshan the jhaa.D-farshi
jo phool the sab kanwal bane the

tarab ki naazish ki haa.n lachakiye
adab wo bandish ki hil na sakiye
ye josh-e-ziddain tha ki paude
kasha-kashe arra ke tale the

KHuda ki qudrat ki chaand haq ke
karoro.n manzil me.n jalwa kar ke
abhi na taaro.n ki chhao.n badli
ki noor ke ta.Dke aa liye the

nabi-e-rahmat ! shafi’-e-ummat !
Raza pe lillaah ho ‘inaayat
ise bhi un KHil’ato.n se hissa
jo KHaas rahmat ke waa.n baTe the

sana-e-sarkaar hai wazeefa
qabool-e-sarkaar hai tamanna
na shaa’iri ki hawas, na parwa
rawi thi kya kaise qaafiye the

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